"खुश रह बेटा। बस एक कॉल कर लिया कर। प्लीज।"
इतना कहते ही आदित्य की आवाज फट गई। नहीं, वो रोना नहीं था। यारों वाला बाप रोता नहीं। बस उसकी आंखों में वो पहली 'नमी' थी, जो रिया ने अपनी जिंदगी में पहली बार देखी थी। नींद नहीं आती।"
आदित्य शर्मा को शहर के तमाम लोग 'लोहे का आदमी' कहते थे। जो इंसान बैंक की ऑडिट में भी नहीं डरता, जिसने कभी अपने ऑफिस में इमोशन नहीं दिखाया। रिया के लिए वो हमेशा एक सुपरहीरो थे—जो बाइक की चाबी छुपा देते थे, रात 10 बजे का कर्फ्यू सेट कर देते थे, और जिसकी एक आंख देखते ही सारे दोस्त पार्क से भाग जाते थे। नींद नहीं आती।"
तो अगली बार जब आप अपने डैडी से लड़ें कि "यू आर टू कंट्रोलिंग", तो याद रखना—वो कंट्रोल प्यार है। और वो 'पहली बार' जब बाप ने आपको छोड़ा था स्कूल में, या पहली बार जब बाप ने आपको बस में अकेले भेजा था—वो दिन ही उसकी सबसे बड़ी जर्नी थी। नींद नहीं आती।"
बाप: "ये ले। स्प्रे है, बेटा। गलत हाथ लगे तो आंख में मार देना। और ये कैमरा, किसी ने पीछा किया तो तुरंत रिकॉर्ड कर लेना।"
जाने से एक रात पहले, नॉर्मल ही डिनर चल रहा था। रिया मस्टू (घर के डॉगी) को बिस्किट खिला रही थी। तभी आदित्य ने बिना मुंह देखे कहा: "रिया, वो... ट्रेन में फास्टनिक्स मत लगाया करना, छीन लेते हैं लोग। और रात को लेट हो तो उबर शेयर नहीं करना।"
रिया चौंक गई। यह वही बाप था जो उसे कभी स्कूटी देने से मना करता था, जिसके सामने वो कभी बॉयफ्रेंड का नाम नहीं लेती थी। वो ही आज कह रहा था— "पता है बेटी, मुझे डर लगता है। बस एक कॉल का लालच है। जब तक फोन न आए, नींद नहीं आती।"